नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में झुग्गियों को तोड़ने और पुनर्वास देने की प्रक्रिया को लेकर लगातार बहस छिड़ी हुई है। एक ओर गरीब परिवार इसे अपने सिर से छत छिनने जैसा मानते हैं, वहीं प्रशासन का तर्क है कि झुग्गियों को तोड़ना कई कारणों से आवश्यक है।
1. अवैध कब्ज़े और सरकारी जमीन का उपयोग
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और नगर निकायों के अनुसार, बड़ी संख्या में झुग्गियाँ सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बनी हुई हैं। इनमें से कई इलाके रेलवे ट्रैक, हाईवे, नहर किनारे और हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) पर बसे हैं। अधिकारियों का कहना है कि सरकारी जमीन का सही उपयोग तभी संभव है जब अवैध कब्ज़े हटाए जाएँ।
2. विकास परियोजनाओं में रुकावट
दिल्ली में मेट्रो विस्तार, रैपिड रेल, सड़क चौड़ीकरण और फ्लाईओवर जैसी परियोजनाएँ लगातार चल रही हैं। कई बार झुग्गियों की वजह से यह प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हो पाते। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल कॉरिडोर और कई मेट्रो स्टेशनों के आसपास झुग्गियों को हटाना अनिवार्य बताया गया ताकि निर्माण कार्य सुचारु रूप से हो सके।
3. सुरक्षा और दुर्घटना का खतरा
रेलवे ट्रैक और नालों के किनारे बसी झुग्गियाँ अक्सर हादसों का कारण बनती हैं। कई मामलों में आग लगने, बीमारी फैलने और बारिश के दौरान बाढ़ जैसी स्थिति बनी है। अधिकारियों का कहना है कि झुग्गियों की तंग गलियों में दमकल या एंबुलेंस का पहुँचना लगभग नामुमकिन होता है, जिससे लोगों की जान पर संकट बना रहता है।
4. साफ-सफाई और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ
झुग्गी बस्तियों में गंदगी, सीवरेज और कचरे की समस्या गंभीर है। यहाँ डेंगू, मलेरिया और संक्रामक बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि झुग्गियों के स्थान पर नियोजित आवास बनाए जाएँ तो इन समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है।
5. पुनर्वास और योजनाबद्ध शहरीकरण
सरकार का दावा है कि झुग्गी तोड़ने का उद्देश्य केवल उजाड़ना नहीं है, बल्कि झुग्गीवासियों को पुनर्वास योजना के तहत पक्के मकान उपलब्ध कराना है। ‘जहाँ झुग्गी, वहाँ मकान’ नीति के तहत पहले ही कई हजार परिवारों को ईडब्ल्यूएस (EWS) फ्लैट दिए जा चुके हैं। अधिकारी कहते हैं कि इससे झुग्गीवासियों को बेहतर जीवन स्तर, पानी-बिजली की सुविधा और कानूनी घर का हक मिलता है।
