
अमेरिका का मानना है कि यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों का हिस्सा है। जो व्यापार घाटे को कम करने करने के लिए हैं।
इस लेख में, मैंने इस टैरिफ के भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पडऩे वाले असर का विश्लेषण किया है साथ ही अमेरिका के दोगलेपन को भी आसन भाषा ने समझाने की कोशिश की है, और यह भी समझाऊंगा कि क्या यह भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है?
भारत पर टैरिफ क्यों लगाया गया?
- दूसरा कारण: पहलगांव हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध को रूकवाने का क्रेडिट भारत ने अमेरिका को नहीं दिया, और अमेरिका को झूटा साबित किया।
- तीसरा कारण: भारत 65 प्रतिशत अपनी सुरक्षा के लिए हथियार रूस से खरीदता है। अमेरिका भारत पर दबाव बनाता रहा कि वह अपने सुरक्षा हथियार अमेरिका से खरीदे लेकिन भारत यह कैसे भूल सकता है कि अमेरिका ने हमें युद्ध के समय कितनी बार धोखा दिया है। चाहे वह कारगिर युद्ध हो या 1971 का युद्ध, अमेरिका ने हमेशा भारत पीठ में हमेशा खंजर घोंपा है।
इसके अलावा, अमेरिका का दावा है कि भारत के साथ उसका व्यापार घाटा 2023-24 में 35.31 अरब डॉलर था, और यह टैरिफ इस असंतुलन को कम करने का प्रयास है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 में 186 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है, जिसमें अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत है। 50प्रतिशत टैरिफ का असर कई क्षेत्रों पर पड़ेगा।
- निर्यात में कमी: ज्यादा टैरिफ के कारण भारतीय वस्तुएं, जैसे रत्न-आभूषण, कपड़ा, दवाइयां, पेट्रोकेमिकल्स, और स्टील-एल्यूमीनियम, अमेरिकी बाजार में महंगी हो जाएंगी। इससे इन वस्तुओं की मांग में कमी आ सकती है, जिससे भारत का निर्यात 2 से 7 अरब डॉलर तक कम हो सकता है।
- रोजगार पर असर: टैरिफ का असर उद्योगों, जैसे रत्न-आभूषण और कपड़ा उद्योग, में लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। निर्यात में कमी से इन उद्योगों पर दबाव पड़ेगा, जिससे नौकरियां जाने का खतरे बन सकता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली और सूरत के रत्न-आभूषण बाजार को बड़ा झटका लग सकता है।
- आर्थिक मंदी का खतरा: अगर निर्यात में भारी कमी आती है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी, उत्पादन कम होगा, और आर्थिक मंदी की स्थिति बन सकती है।
- रुपये पर दबाव: निर्यात में कमी से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित हो सकता है, जिससे रुपये में कमजोरी आ सकती है। हाल ही में, टैरिफ की खबरों के बाद रुपया 85.69 के स्तर तक पहुंच गया था।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था, जो 3.73 ट्रिलियन डॉलर की है और विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इस टैरिफ के प्रभाव को झेल सकती है। भारत की मजबूत घरेलू मांग और 6.5-7.5 प्रतिशत की विकास दर इसे लचीलापन प्रदान करती है।
आम लोगों पर भी पड़ेगा प्रभाव
टैरिफ का असर केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, यह आम लोगों के जीवन पर भी असर डालेगा। यदि भारत जवाबी टैरिफ लगाता है, तो अमेरिका से आयातित वस्तुएं, जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां, और डेयरी उत्पाद, महंगे हो सकते हैं। इससे आम लोगों के लिए जीवनयापन की लागत बढ़ सकती है। निर्यात-निर्भर उद्योगों में नौकरियों के कम होने से बेरोजगारी बढ़ सकती है। विशेष रूप से, तिरुपुर के कपड़ा उद्योग और सूरत के रत्न-आभूषण उद्योग जैसे क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं, जिससे लाखों कारीगरों और श्रमिकों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।
टैरिफ के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है, जिससे घरेलू बाजार में कुछ वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। जैसे कि सोना और चांदी पहले ही आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रहे हैं, और टैरिफ से ये और महंगे हो सकते हैं।
शेयर बाजारों में गिरावट
टैरिफ और जवाबी टैरिफ से वैश्विक व्यापार युद्ध की स्थिति बन सकती है, जिससे शेयर बाजारों में गिरावट और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ सकती है। हाल ही में, टैरिफ की खबरों के बाद भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी गई।
क्या भारतीय अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी?
यह कहना कि 50 प्रतिशत टैरिफ से भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी, अतिशयोक्ति होगी। भारत की अर्थव्यवस्था कई कारणों से इस झटके को सहन करने में सक्षम हो सकती है। विविध व्यापारिक साझेदार। भारत का व्यापार केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते भारत के निर्यात को बढ़ावा दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापार 50 अरब डॉलर से बढ़कर 150 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
- मजबूत घरेलू मांग: भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से घरेलू मांग पर निर्भर है, जो इसे वैश्विक झटकों से बचाने में मदद करती है। 2023-24 में 8.2प्रतिशत की विकास दर इसकी मजबूती को दर्शाती है।
- कृषि निर्यात में संभावनाएं: कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, भारत अपने कृषि निर्यात को बनाए रख सकता है, क्योंकि अन्य प्रतिस्पर्धी देशों पर भी उच्च टैरिफ लगाए गए हैं। समुद्री खाद्य और चावल जैसे उत्पादों पर प्रभाव सीमित हो सकता है।
- चल रही व्यापार वार्ताएं: भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है, जिसका लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। यदि भारत टैरिफ में कमी के लिए अमेरिका को मना लेता है, तो प्रभाव को कम किया जा सकता है। हालांकि, यदि टैरिफ लंबे समय तक लागू रहता है और जवाबी टैरिफ से व्यापार युद्ध शुरू होता है, तो भारत को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से, छोटे और मध्यम उद्यमों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर इसका असर गंभीर हो सकता है।
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाया गया 50 प्रतिशत टैरिफ निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर प्रभाव डालेगा। निर्यात में कमी, बेरोजगारी में वृद्धि, और महंगाई जैसे अल्पकालिक प्रभाव देखे जा सकते हैं। हालांकि, भारत की मजबूत घरेलू मांग, विविध व्यापारिक साझेदार, और चल रही व्यापार वार्ताएं इसे इस झटके से उबरने में मदद कर सकती हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बर्बाद होने से बचाने के लिए सरकार को त्वरित कदम उठाने होंगे, जैसे वैकल्पिक बाजारों की तलाश, घरेलू उद्योगों को समर्थन, और व्यापार समझौतों को मजबूत करना।
इसके साथ ही, आम लोगों को भी इस आर्थिक अनिश्चितता के लिए तैयार रहना चाहिए। सरकार और उद्योगों को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करें। यह समय भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन सही रणनीतियों के साथ, यह एक अवसर भी बन सकता है।
अमेरिका का दोगलापन
अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत को रूस से व्यापार करने से रोका, बल्कि भारत नहीं कई देखो को रूस से व्यापार ना करने के धमकी दी। दोगलापन देखिए, अमेरिका ने युद्ध के बाद रूस से भर कर व्यापार किया।
रूस-यूक्रेन युद्ध, जो फरवरी 2022 में शुरू हुआ, के बाद से अमेरिका और रूस के बीच व्यापारिक संबंधों पर पश्चिमी प्रतिबंधों का प्रभाव पड़ा है, लेकिन व्यापार पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है।
फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और यूक्रेन युद्ध के लिए उसकी वित्तीय क्षमता को कम करना था। प्रतिबंधों में रूसी तेल और गैस के आयात पर आंशिक रोक, बैंकों पर प्रतिबंध, और कुछ तकनीकी निर्यातों पर पाबंदी शामिल थी।
2022 में, प्रतिबंधों के बावजूद, अमेरिका और रूस के बीच व्यापार जारी रहा। यूएसटीआर के अनुसार, अमेरिका ने रूस से लगभग 4.7 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जिसमें मुख्य रूप से खनिज, धातु (जैसे यूरेनियम, पैलेडियम, और टाइटेनियम), और रासायनिक उत्पाद शामिल थे।
अमेरिका ने रूस को लगभग 1.2 अरब डॉलर का निर्यात किया, जिसमें कुछ औद्योगिक सामग्री और उपकरण शामिल थे। रूसी तेल पर प्रतिबंध मार्च 2022 में लागू होने के बाद, अमेरिका ने रूस से कच्चे तेल का आयात लगभग बंद कर दिया। हालांकि, कुछ रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का आयात सीमित मात्रा में जारी रहा।
2023 में, अमेरिका ने रूस से 4.5 अरब डॉलर का सामान आयात किया। इसमें यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड (परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए), पैलेडियम (इलेक्ट्रिक वाहनों और अन्य उद्योगों के लिए), और उर्वरक जैसे उत्पाद शामिल थे। निर्यात में कमी आई, और अमेरिका ने रूस को 0.6 अरब डॉलर (600 मिलियन डॉलर) से अधिक का सामान निर्यात किया।
यूरेनियम आयात अमेरिका के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि रूस वैश्विक यूरेनियम आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा प्रदान करता है। इसके अलावा, कुछ रासायनिक और धातु उत्पादों का आयात भी जारी रहा।
प्रतिबंधों का अमेरिका पर क्या प्रभाव पड़ा?
अमेरिका ने रूस के साथ व्यापार को कम रखने की कोशिश की, लेकिन कुछ जरूरी सामान (जैसे यूरेनियम और पैलेडियम) के लिए वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता तुरंत उपलब्ध नहीं थे। 2024 में, अमेरिका और रूस के बीच कुल व्यापार 30,000 करोड़ रुपये (लगभग 3.6 अरब डॉलर) से अधिक रहा। इसमें से अमेरिका ने रूस से लगभग 25,000 करोड़ रुपये (लगभग 3 अरब डॉलर) का सामान आयात किया, और अमेरिका ने रूस को 4,600 करोड़ रुपये (लगभग 550 मिलियन डॉलर) का सामान निर्यात किया।
क्या झुका अमेरिका, क्या था कारण?
यूरेनियम: अमेरिका के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए यूरेनियम आयात महत्वपूर्ण रहा।
पैलेडियम और निकल: इलेक्ट्रिक वाहन और अन्य उद्योगों के लिए।
उर्वरक और रासायनिक उत्पाद: कृषि और रासायनिक उद्योगों के लिए।
भारत ने अमेरिका के इस दोगलेपन पर कई बार सवाल उठाया, क्योंकि अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल और हथियार खरीदने के लिए 50 प्रतिशत टैरिफ और जुर्माना लगाया, जबकि वह स्वयं रूस से आयात जारी रखे हुए था।
2025 की शुरुआत में, अमेरिका और रूस के बीच व्यापार जारी रहा। जनवरी में, अमेरिका ने रूस से 19.6 करोड़ डॉलर और मार्च में 523 करोड़ डॉलर (लगभग 630 मिलियन डॉलर) का सामान आयात किया। निर्यात के आंकड़े सीमित हैं, लेकिन अनुमानित रूप से 100-150 मिलियन डॉलर प्रति तिमाही रहा।
भारत ने रूस से कितना व्यापार किया?
2024 में, भारत और रूस के बीच कुल व्यापार 65.42 अरब डॉलर का था, जिसमें रूस से कच्चे तेल का आयात (43.2प्रतिशत भारत की कुल तेल आवश्यकता) प्रमुख था। तुलनात्मक रूप से, अमेरिका का रूस के साथ व्यापार भारत की तुलना में बहुत कम है, लेकिन यह फिर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह रणनीतिक सामग्रियों (जैसे यूरेनियम) पर केंद्रित है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से, अमेरिका और रूस के बीच व्यापार में कमी आई है, लेकिन यह पूरी तरह से बंद नहीं हुआ। 2022 से 2025 तक, अमेरिका ने रूस से लगभग 12-15 अरब डॉलर का सामान आयात किया और 2-3 अरब डॉलर का निर्यात किया। यह व्यापार मुख्य रूप से यूरेनियम, पैलेडियम, उर्वरक, और रासायनिक उत्पादों पर केंद्रित रहा।
अमेरिका की नीतियों पर भारत जैसे देशों ने सवाल उठाए हैं, क्योंकि वह खुद रूस के साथ व्यापार करता रहा, लेकिन अन्य देशों पर प्रतिबंध और टैरिफ थोप दिया।
